गुरुवार, 20 दिसंबर 2012

गुजरात मे फिर कमल ने किया कमाल : मोदी की विजय के मायने


जैसा की गुजरात चुनाव के नतीजे आज आ गए  और नरेंद्र मोदी पुनः बहुमत के साथ गुजरात की सत्ता पर काबिज होने जा रहे हैं। हालांकि ये बात लगभग तय थी की नरेंद्र मोदी की सरकार गुजरात मे दोबारा आने वाली है अब गुजरात चुनावों के फैसले के बाद कई बातें  निकलकर सामने आई है । सबसे स्वाभाविक बात ये है की नरेंद्र मोदी ने खुद को भाजपा के प्रधानमंत्री पद के प्रबल दावेदार के रूप मे स्थापित कर लिया है । अब  इस दावेदारी को औपचारिक या अनौपचारिक रखना है बहस और निर्णय  सिर्फ इसी बात का हो सकता  है । दूसरी ओर इसमे कोई दो राय नहीं की गुजरात मे विकास हुआ है मगर कम से कम नरेन्द्रमोदी और उनके प्रबन्धक ये अच्छी तरह से जानते हैं  की "विकास पुरुष" के गुणगान करना अलग बात है मगर विकास पुरुष को वोट करना दूसरी ॥ इसके ज्वलंत उदाहरण माननीय अटल बिहारी वाजपेयी जी 2004 मे रहे है । अब भी यदि गुजरात मे कोई निर्णायक कारक है तो वो है मुस्लिम बनाम हिन्दू वोटों का ध्रुवीकरण । ये एक ऐसा कटु सत्य  है जिसे हिंदुस्थान मे कश्मीर के बाद सबसे पहले गुजरात के लोगो ने स्वीकार किया है । शायद इन चुनाव परिणामो ने हिंदुस्थान मे 2030  के बाद से होने वाले चुनाओं एवं राजनीतिक परिदृश्य का एक परिलक्षण भी दिया है,वो ये है की अब आने वाले दो दसको मे भले ही राजीनीतिक पार्टियां दर्जनो हो मगर विचारधारा और गठबंधन सिर्फ दो ही होंगे । या तो आप हिन्दुत्व के समर्थक हैं या तो आप इस्लाम के झंडे के साथ है । दो दसको मे मुस्लिम जनसंख्या बढ़ेगी और आकडे बताते हैं की उस अनुपात मे हिन्दू जनसंख्या नहीं बढ़ेगी । और जम्मू और कश्मीर का उदाहरण ले तो जिस राज्य मे मुसलमान ज्यादा होंगे हिंदुओं पर अत्याचार और उनके धार्मिक रीति रिवाजों पर लगाम कसने की शुरुवात होगी और फिर हिंदुओं को मजबूरीवश या आत्मरक्षार्थ विभिन्न जतियों और सेकुलर जैसे शब्दो की परिभाषा से उठाकर "हिन्दू " बनकर किसी एक जगह वोट करना होगा जैसा कश्मीर मे हो रहा है। जनसंख्या के अनुपात से गुजरात मे अभी ध्रुवीकरण का दौर नहीं होना चाहिए था मगर मगर आतंक की पौध के बबूलरूपी काँटों ने गोधरा मे जिस प्रकार की चुभन हिन्दू समाज को दी थी वो सुसुप्त ज्वालामुखी 20 साल पहले फट पड़ा । इस बात को एक उदाहरण से और समझ सकते हैं जहां भी हिन्दू बहुसंख्यक है वहाँ बार बार सरकारे बदलती है क्यूकी वहाँ स्वाभाविक रूप से आतंकियों को सर उठाने का मौका कम मिलता है धार्मिक रीति रिवाजों मे हस्तक्षेप कम होता है अतः ध्रुवीकरण की संभावना कम हो जाती है ,इसी मौके का फायदा उठाकर "कांग्रेस" नामक पार्टी तुष्टीकरण के समर्थको के साथ सत्ता मे आ जाती है और हिमांचल प्रदेश के परिणाम इसका उदाहरण है।  हिमांचल मे हिन्दू बहुतायत है या हिंदुओं को स्वतन्त्रता है अपने विचारधारा पर चलने की अतः ध्रुवीकरण की संभावना कम है और हिन्दू विभाजित जिसका परिणाम क्या हुआ कांग्रेस पार्टी पर गंभीर आरोपो के बाद भी भाजपा सत्ता से बाहर हो गयी।   

इन सब तथ्यों से  एक बात तो स्पष्ट है की "विकास" ,प्रतिभाजीडीपीबिदेशी निवेश जैसे तथ्य उन्ही स्थानो पर चुनावी मुद्दा बन सकते हैं जहां या तो हिन्दू बहुसंख्यक  है और उसकी स्वतन्त्रता का अतिक्रमण नहीं हुआ है अल्पसंख्यक  बहुल स्थानो पर एकमात्र मुद्दा है इस्लाम का प्रचार और प्रकारांतर से  शरीयत लागू करना । 
2014 मे शायद भाजपा का एक धड़ा ये सोच रहा है की सेकुलरिज़्म का चोला ओढ़ कर कुछ अल्पसंख्यक मत आएंगे तो ये 2004 के "इंडिया शाइनिंग" के दौर मे वाजपेयी जी जैसे व्यक्तित्व को भी अल्पसंख्यक समुदाय अपना नहीं पाया । सत्य ये है की हिंदुस्थान मे अल्पसंख्यक  वोट सिर्फ उसी को मिलता है जो हिन्दू विरोधी हो । अतः इस प्रकार का आत्मघाती प्रयोग एक बुरे दिवास्वप्न से ज्यादा कुछ नहीं। 
भविष्य जो भी हो कम से कम आज मोदी जी की विजय ने हिंदुस्थान के हिंदुओं को खुश होने का एक कारण जरूर मिला है और भारतीय जनता पार्टी को 2014 चुनाओं मे सत्ता के एक सशक्त दावेदार के रूप मे उभरने के लिए संबल।
चलते चलते 
हिन्दू हो,कुछ प्रतिकार करो,तुम भारत माँ के क्रंदन काI
यह समय नहीं हैशांति पाठ और गाँधी के अभिनन्दन काII
यह समय है शस्त्र उठाने का,गद्दारों को समझाने का,
शत्रु पक्ष की धरती पर,फिर शिव तांडव दिखलाने काII
इन जेहादी जयचंदों की घर में ही कब्र बनाने का,
यह समय है हर एक हिन्दू के,राणा प्रताप बन जाने काI
इस हिन्दुस्थान की धरती पर ,फिर भगवा ध्वज फहराने काII

जय  श्री राम 

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