मंगलवार, 7 मई 2013

चीन के हाथो एक और पराजय की गवाही देता दौलतबेग ओल्डी


दौलत बेग ओल्डी से चीनी सेना के बनकर हटाये जाने का कांग्रेस सरकार और कांग्रेस पोषित मिडिया

कुछ इस प्रकार ढिंढोरा  पिट रहे हैं जैसे उन्होंने ६२ में चीन द्वारा कब्ज़ा की हुई हजार वर्ग मिल की जमीं वापस पा ली हो .. ज्ञातव्य को की चीन का सीमा विवाद दशको पहले तिब्बत विद्रोह के बाद सन १९५९ में दलाई लामा को भारत में शरण देने के बाद से ही चला है जिसकी परिणिति कांग्रेस के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु  के शासन काल में १९६२ में हुए भारत चीन युद्ध के रूप में हुआ .. हिंदी चीनी भाई  भाई के नारे को देकर तत्कालीन चीनी प्रधानमंत्री चाऊ इन लाई ने भारत पर आक्रमण का आदेश दिया और आधार बनाया मैकमोहन रेखा और हिमालय क्षेत्र की सीमा के निर्धारण को .. उस युद्ध में भारत की पराजय हुई और हमारा लद्दाख और अक्साई चीन की लगभग ७२ हजार वर्गमील जमीं चीन ने कब्ज़ा कर ली .. साथ ही साथ तिब्बत पर चीनी प्रभुत्त्व स्थापित हो गया . हमारे तात्कालिक प्रधानमत्री जवाहर लाल नेहरु उस समय कोट पर लाल गुलाब और सफ़ेद कबूतर उड़ने में व्यस्त थे और हमारा कैलाश जैसा धार्मिक क्षेत्र चीन के कब्जे में चला गया.. इस पराजय के बाद वास्तविक नियंत्रण रेखा को सीमा रेखा के रूप में मान कर विवादों का निपटारा द्विपक्षीय वार्ता के माध्यम से करने का समझौता हुआ जो की भारत के लिए एकतरफ़ा था.. आज त५अक चीन ने अरुणांचल प्रदेश से अपना दावा नहीं छोड़ा है . यहाँ चीन की दोगली नीति इसी बात से परिलक्षित होती है की जिस मैकमोहन रेखा को चीन ने कभी मान्यता नहीं दी उसी के अंतर्गत उसने पाकिस्तान के साथ अपना सीमा निर्धारण कर लिया. 



१९६२ की हार के बाद हिंदुस्थानी सेना ने अपने सामरिक तैयारियों में तेजी तो ले आया मगर कमुनिस्ट शासन में चीन की तैयारियां हिन्दुस्थान से दो कदम आगे ही रही. रक्षा उपकरणों की खरीद में दलाली एवं लालफीताशाही के कारन रक्षा सौदों में देरी ने चीन और भारत की सामरिक तैयारियों और चीन की सामरिक क्षमता में एक बहुत बड़ा अन्तर आ गया जिसे बढ़ने में भारतीय राजनेताओं की ढुलमुल इच्छाशक्ति ने बहुत बड़ा योगदान दिया. युद्ध के बाद सिर्फ इंदिरा गाँधी और अटल बिहारी वाजपेयी ने सिर्फ राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिचय दिया अन्यथा ज्यादातर प्रधानमंत्री चीन के सामने घुटने टेकने की नीति पर लगे रहे और इसमें सबसे शर्मनाक योगदान मनमोहन सिंह की वर्तमान कांग्रेस सरकार का रहा जिसने संसद में  ये बाद स्वीकारी की चीन ने सैकड़ो बार सीमा का उलंघन किया और भारत सरकार अपनी राजनितिक नपुंसकता का परिचय देते हुए इसे छोटी घटना माना.. सत्य ये है की कांग्रेसी सरकार भय खाने लगी है चीन से और रोज नए नए घोटालों से घरेलू मोर्चे पर दो चार होती कांग्रेस सरकार के पास बिदेशी नीति के स्तर पर आत्मसम्मान ख़तम हो चूका है . इसी कारण पाकिस्तान जैसा देश भी हमारे सैनिको के सर काट के भेजता है और हिन्दुस्थान की सरकार जबाब देने के स्थान पर सांकेतिक विरोध प्रदर्शन में व्यस्त रही है तो कभी हमारे विदेशमंत्री पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को बिरयानी परोसने में व्यस्त रहते हैं .

अभी हाल की घटना में पुनः एक बार चीन ने हिंदुस्थानी सीमा क्षेत्र में लद्दाख के निकट दौलत बेग ओल्डी जो की लद्दाख में आता है में लगभग १९ किलोमीटर तक  अतिक्रमण कर लिया और अपने टेंट लगा लिए . हलाकि भारत सरकार इसे एक स्थानीय मुद्दा मान के आँखें चुरा रही थी मगर इसके पहले भी यदि हम देखें तो मनरेगा के तहत होने वाले काम को लद्दाख में चीन ने पहले भी रुकवाया है और भारत सरकार नपुन्सको की तरह झुकते हुए कार्य बंद कर दिया ..
हाल के दिनों में भारतीय सेना के चीन से सटी सीमा पर दौलत बेग ओल्डी
फुक्चे और न्योमामें ढांचागत सुविधाओं के निर्माण कार्य से चीन असहज हो रहा था और उसे रोकने के उद्देश्य से ये बार बार अतिक्रमण किया गया .
अबकी बार चीन ने पीछे हटने की शर्त रखते हुए गतिरोध तो सुलझाने के लिए चुमार जो की एक सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण पोस्ट थी वह से भारतीय सेना के बंकर हटाने और भविष्य में  पूर्वी लद्दाख में स्थायी निर्माण का काम बंद करने और कोई गतिविधि न करने की शर्त रख दी कांग्रेस सरकार ने चीन के सामने घुटने टेकते हुए और अपनी इज्जत बचने के उद्देश्य से चुमार से सेनाएं वापस बुला ली  वर्तमान स्थिति ये है की  चीनी सेना लद्दाख के देपसांग से तब गईजब इंडियन आर्मी चुमार से बंकर नष्ट करने के लिए राजी हुई। और पुनः चीन ने चालबाजी दिखाते हुए 19 किलोमीटर अतिक्रमण की हुई जमीन से सिर्फ २ किलोमीटर ही पीछे हटा है यानि अभी भी भारतीय भूभाग में चीन का अतिक्रमण है और भारतीय सेना पीछे हटती जा रही है हालत छोटे स्तर वैसे ही हैं जैसे १९६२ में थे अंतर इतना है की उस समय हमारे जवानों को प्रतिउत्तर देने की छुट थी आज उनके हाथ कांग्रेस सरकार की निकृष्ट बिदेश नीति  ने बांध रखें हैं.
एक दलाल किस्म के पत्रकार ने इसे कारगिल से बड़ी विजय के रूप में दिखाया मगर कारगिल में वाजपेयी जी के आदेश पर हमारे सीमा में घुस आये पाकिस्तानियों को हमने भगाया था न की अपने ही क्षेत्र में पीछे हटते हुए स्वयं के बनकर नष्ट किये थे .. आज स्थिति है की जिस जगह से भारतीय सेना चीन के दबाव एवं कांग्रेस सरकार के आदेश से पीछे हटी है वो अब भारतीय क्षेत्र से नो मैन्स लैंड(NO MANS LAND)  बन गया है और थोड़े दिन बाद चीन के कब्जे में ... 
चीन के लिए हिन्दुस्थान एक बड़ा बाजार है शायद हिन्दुस्थान की सरकार ने दृढ राजनितिक इच्छाशक्ति का परिचय दिया होता तो हम सरे व्यापारिक सम्बन्ध चीन से ख़तम करके उस पर एक दबाव बना सकते थे इस कार्य में सहर्ष चीन का प्रतिद्वंदी अमरीका भी हमारे साथ होता . यथार्थ ये है की कांग्रेस शासन में चीन को उसकी भाषा में जबाब देने का सामर्थ्य किसी को नहीं है और हमारे सभी पडोसी धीरे धीरे हमारी सीमाओं का अतिक्रमण कर रहे हैं कभी बांग्लादेश में तो कभी पाकिस्तान तो कभी चीन यहाँ तक की नेपाल जैसा  देश भी अब भारत की सीमाओं में घुसने लगा है ..
शायद ये कांग्रेस की नपुंसक बिदेशनीति और रक्षानीति का पार्श्व प्रभाव है. दुखद ये है की मिडिया का एक तबका कांग्रेस की इस नाकामी और हिन्दुस्थान की एक और हार को अपनी विजय के रूप में प्रदर्शित कर रहा है और वास्तविकता के धरातल पर हमने कई किलोमीटर भूमि फिर खो दी भारत माँ का एक और अंग भंग कांग्रेस सरकार की नीतियों ने कर दिया.. 

शुक्रवार, 22 मार्च 2013

अयोध्या एवं राम जन्मभूमि का इतिहास -7(History of Ayodhya and Ram Temple-7)




मुसलमानो द्वारा श्री राम जन्म भूमि के उद्धार का प्रयास 
सन 1857 की अंग्रेज़ो के खिलाफ हुई क्रांति मे बहादुर शाह जफर को सम्राट घोषित करके विद्रोह का नारा बुलंद किया गया। उस समय अयोध्या के हिन्दू राजा देवी बख्श सिंह
,गोंडा के नरेश एवं बाबा  राम चरणदास की अध्यक्षता मे संगठित हो गए । उस समय समय बागी मुसलमानो के नेता थे आमिर अली। आमिर अली ने अयोध्या के समस्त मुसलमानो को इकट्ठा करके कहा कि विरादरे वतन बेगमों के जेवरातों को बचाने मे हमारे हिन्दू भाइयों ने जिस परकर बहुदृपूर्व युद्ध किया है उसे हम भुला नहीं सकते । सम्राट बहादुरशाह जफर को अपना सम्राट मानकर हमारे हिन्दू भाई अपना खून बहा रहे हैं। इसलिए ये हमारा फर्ज बनता है कि हिंदुओं के खुदा श्रीरामचंद्र जी कि पैदायिसी जगह जो बाबरी मस्जिद बनी है, वह हम इन्हे बख़ुशी सपुर्द कर दे क्यूकी हिन्दू मुसलमान नाइत्फ़ाकी कि सबसे बड़ी जड़ यह बाबरी मस्जिद ही है । ऐसा करके हम इनके दिल पर फतह पा जाएंगे ।

ये बात भी सत्य है कि आमिर अली के इस प्रस्ताव का सभी मुसलमानो ने खुले दिल से एक स्वर से समर्थन किया । यहाँ एक बात जो ध्यान देने योग्य है कि आमिर अली के इस प्रस्ताव के बाद ये बात स्पष्ट हो जाती है कि मुसलमान भी जानते और मानते थे कि बाबरी ढांचा रामलला के जन्मभूमि पर बने मंदिर को ध्ब्वंस करके ही बनाया गया है। चूकी मुसलमान यह बात समझ चुके थी कि हिंदु कभी किसी के अस्तित्व के लिए खतरा नहीं हो सकता मगर अंग्रेज़ उनके समूल विनाश के उद्देश मे लगे हुए थे अतः इस बात पर एक सहमति बनती नजर आई ।
यह बात जब अङ्ग्रेज़ी सरकार को पता चली कि मुसलमान बाबरी मस्जिद हिंदुओं के हवाले करने का मन बना चुके हैं तो उनमे घबराहट फैल गयी। इस घबराहट का प्रमाण हम कर्नल मार्टिन कि एक रिपोर्ट मे देख सकते हैं जो जो सुल्तानपुर गजेटियर के पृष्ठ 36 पर छपी थी
“अयोध्या कि बाबरी मस्जिद को मुसलमानो द्वारा हिंदुओं को दिये जाने कि खबर सुनकर हम लोगो मे घबराहट फैल गयी है और यह विश्वास हो गया है कि हिंदुस्तान से अंग्रेज़ अब खतम हो जाएंगे । लेकिन अच्छा हुआ कि गदर का पासा पलट गया और आमिर अली तथा बलवाई बाबा राम चरण दास को फांसी पर लटका दिया गया जिससे फैजाबाद के बलवाइयों कि कमर टूट गयी और पूरे फैजाबाद जिले पर हमारा रोब जम गया क्यूकी गोंडा के राजा देवीबख्श सिंह पहले ही फरार हो चुके थे ॥
मुसलमानो द्वारा आमिर अली के रूप मे किया गया जमभूमि के उद्धार हेतु यह सतप्रयत्न अंग्रेज़ो कि कुटिल चल और दमनचक्र के कारण विफल हो गया ।
18 मार्च सन 1858 को कुबेर टीला स्थित एक इमली के पेड़ मे बाबा राम चरण दास और आमिर अली दोनों को एक साथ अंग्रेज़ो ने फांसी पर लटका दिया । मुसलमानो ने हिंदुओं पर चाहे कितने भी जुल्म किए हो मगर हिन्दू जनता मुसलमानो के इस एकमात्र प्रयास को भूली नहीं और बहुत डीनो तक आमिर अली और  बाबा राम चरण दास कि याद मे उस इमली के पेड़ पर पुजा अर्चना और अक्षत चढ़ाती रही। जब अंग्रेज़ो ने ये देखा कि ये पेड़ देशभक्तों एवं रामभक्तों के लिए एक स्मारक के रूप मे विकसित हो रहा है तब उन्होने इस पेड़ को कटवा कर इस आखिरी निशानी को भी मिटा दिया...
इस प्रकार अंग्रेज़ो की कुटिल नीति के कारण मुसलमानो का हिंदुओं को बाबरी ढांचा सौपने का यह एकमात्र प्रयास विफल हो गया ...
इसके बाद अङ्ग्रेज़ी राज मे कुछ छिटपुट घटनाएँ एवं प्रतिरोध होते रहे। आजादी के बाद के घटनाक्रम का वर्णन करने से पूर्व सर्वप्रथम कुछ अन्य घटनाओं और स्थलों का वर्णन करना प्रासंगिक है
,जिससे बाबरी ढांचे मे प्राचीन मंदिर के चिन्ह दर्शनीय होते हैं ।
इन सारे चिन्हों के बारे मे विस्तृत  विवरण मै अपनी अगली पोस्ट मे दूंगा....



सन्दर्भ:प्राचीन भारत, लखनऊ गजेटियर, लाट राजस्थान,रामजन्मभूमि का इतिहास(आर जी पाण्डेय),अयोध्या का इतिहास(लाला सीताराम),बाबरनामा



जय श्री राम

"आशुतोष नाथ तिवारी"

रविवार, 24 फ़रवरी 2013

राम मंदिर के बाद रामसेतु -- हिन्दू आस्था पर कांग्रेस का इस्लामिक प्रहार (ram setu)


कांग्रेस  सरकार  अब नीचता और हिन्दू विरोध की  पराकाष्ठा  करते हुए  रामसेतु को तोड़ने के कार्य में युद्ध स्तर पर लग गयी है ..शायद चुनावों से पहले मज़बूरी में अफजल को दी गयी  फांसी का असर कम करने के लिए और मुसलमान वोटो की लालसा में रामसेतु को तोड़ने का कार्यक्रम बनाया जा रहा है ..इसी  कड़ी के अंतर्गत सरकार ने आरके पचौरी समिति की सिफारिशों को नकार दिया है।ये वही सरकार है जिसके मंत्री लाख करोड़ रूपये का एक घोटाला करते हैं और अल्पसंख्यक कल्याण के नाम पर लाखो करोड़ जेहादियों को असलहा और बम खरीदने के लिए बाट देती है॥ कांग्रेस सरकार ने सुप्रीम कोर्ट मे हलफनामा दे कर तर्क दिया है की

भारत की सरकार (कांग्रेस) किसी राम के अस्तित्व को नहीं मानती है अतः रामसेतु की बात निरर्थक है ॥जब कांग्रेस सरकार राम को नहीं मानती तो रामसेतु को कैसे मानेगी??

सरकार का दूसरा तर्क है की लगभग 800 करोड रुपए वो खर्च कर चुकी है अतः इस परियोजना को बंद नहीं किया जा सकता॥

पहले तर्क के बारे मे कांग्रेस के
 हलफनामे के मुताबिक केंद्रीय मंत्रिमंडल ने पचौरी के नेतृत्व वाली समिति की रिपोर्ट पर विचार किया और उसकी सिफरिशों को नामंजूर कर दिया। सरकार ने सुनवाई के दौरान रामसेतु को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने पर कोई कदम उठाने से इंकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट से इस पर फैसला करने को कहा था। सरकार ने कहा कि 2008 में दायर अपने पहले हलफनामे पर कायम है जिसे राजनीतिक मामलों की मंत्रिमंडल समिति ने मंजूरी दी थी। इससे पहले अप्रैल में केन्द्र सरकार की ओर से दलील दी गई थी कि वह रामसेतु को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने में असमर्थ है। सरकार आतंकवादी  अफजल के चश्मे और घड़ी को जेहादियों को देने की बात कर सकती है जिसे वो देशद्रोही  संग्रहालय बनाये मगर उसे 100 करोड हिंदुस्थानियों  की आस्था के प्रतीक रामसेतु  को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने में दौरे आने लगते हैं ॥अब हिंदुओं को सोचना होगा की क्या सचमुच द्रोही कांग्रेसियों को अपने घर मे जगह देनी चाहिए जो "राम" जैसे पूज्य के अस्तित्व पर प्रश्न उठाते हैं॥ क्या ये संभव है कांग्रेस का कोई भी देशद्रोही धर्मद्रोही सदस्य “दिग्विजय सिंह के इष्टदेव मुहम्मद साहब”  या अपनी “इटालियन मम्मी” के आस्था के प्रतीक "जीसस" के अस्तित्व पर प्रश्न उठाए ??
अंग्रेज़ो ने सर्वप्रथम हिंदुस्तान पर राज करने के लिए हिंदुस्थानी जनमानस के स्वाभिमान पर चोट की और उसे खतम किया जब व्यक्ति का स्वाभिमान मर जाए तो उसे एक जानवर जैसे रखकर ,पालकर ,प्रताड़ित करके जैसे चाहे वैसे कार्य लिया जा सकता है। इसी क्रम मे अंग्रेज़ो ने बेगार और सार्वजनिक कोड़े लगाने का कुकृत्य शुरू किया।  यही काम हिंदुओं के साथ कांग्रेस कर रही है हिंदुओं की आस्था का हर वो प्रतीक जो जरा भी स्वाभिमान उनमे पैदा करता हो उसे नष्ट करो ॥ अमरनाथ यात्रा का क्या हाल हुआ हम सब देख रहे हैं॥ रामलला रहेंगे तम्बू और बारिश मे और रामसेतु तोड़ा जाएगा। अगर कांग्रेस सरकार मे सचमुच इतना पौरुष बचा है तो क्यूँ नहीं जिस "राम" को काल्पनिक कहते हैं उसकी मूर्तियाँ अयोध्या से हटवा देते हैंहैदराबाद मे मंदिरों मे घंटिया बजाए जाने पर प्रतिबंध भी हिन्दू स्वाभिमान को तोड़ने की कांग्रेस की एक कुटिल चाल है ॥हालांकि बिना सेतु को तोड़े भी वैकल्पिक तरीके से सेतु बनाया जा सकता है मगर कांग्रेस सेतु तोड़ने पर अडिग है क्यूकी सेतु के साथ साथ टूटेगा हिंदुओं का स्वाभिमान ,सेतु के टूटने के साथ कांग्रेस प्रहार करेगी लाखो वर्ष से हिंदुस्थान मे राम को भगवान मानने की आस्था परऔर सेतु के साथ टूटेगा साढ़े सोलह लाख वर्षों से भगवान राम की एक अमर धरोहर जो उस काल मे हमारी सिविल इंजीनियरिंग का अदभूत नमूना है । 

अब यदि कांग्रेस सरकार के दूसरे तर्क 850 करोड रुपए को ले तो क्या लाखों करोडो का घोटाला करने वाले कांग्रेसियों को लाखो साल पुराने हिन्दू स्मृति चिन्ह के लिए टैक्स के 850 करोड भी नहीं मिल रहे हैं और वो पैसे भी हमारे टैक्स के हैं ,हम हिंदुओं की मेहनत के ॥ अगर पैसे की बात है तो कल से दिग्विजय और राहुल गांधी कटोरा ले के खड़े हो जाएँ तो हिंदुस्तान के 100 करोड हिन्दू राम सेतु के लिए 100 रुपए भी देंगे तो रामसेतु का आर्थिक भार सरकार से खतम हो जाएगा और हिन्दू धर्म विरोधी कांग्रेसियों के लिए बख्सीश भी बच जाएगी.

सभी हिन्दू भाइयों को इस विषय पर गंभीरता पूर्वक सोचना होगा की आखिर कांग्रेस की ये साजिश क्या है 
रोमकन्या सोनिया और कांग्रेसियों ने वेटिकन सीटी के आदेश मुस्लिम आतंकवाद पर आंखे मूँद ली  है इससे मुसलमान हिंदुओं को कमजोर करेंगे और अंततः पूर्वोत्तर की तरह हिंदुस्थान को एक ईसाई बहुल राज्य बनाया जाएगा॥
इसी क्रम मे कश्मीर 
,उत्तरप्रदेश,हैदराबाद,बिहार,पश्चिम बंगालऔर आसाम मे हुए हिंदुओं के नरसंहार एवं हिन्दू माताओं बहनो का शील भंग करना आता है । मुसलमानो को आर्थिक एवं राजनीतिक संरक्षण दे कर हिन्दू और हिन्दू अस्मिता को नष्ट करना कांग्रेस सरकार के प्रायोजित कार्यक्रम का प्रथम चरण है॥ अगले चरण मे धीरे धीरे ईसाई मशीनरियों द्वारा भारत का ईसाईकरण. दुखद ये है की कुछ हिन्दू धर्म के द्रोही सेकुलर लोग कांग्रेस के साथ इस साजिश मे शामिल हो गए हैं और कुछ हिन्दू कांग्रेस की इस साजिश को समझ नहीं पा  रहे हैं॥
अब यदि रामसेतु का आर्थिक पक्ष देखें तो ये कांग्रेस की दलाली खाने की एक और चाल है इसकी शुरुआत तब होती हैजब पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति जोर्ज बुश भारत आये थे और एक सिविल न्यूक्लीयर डील पर हस्ताक्षर किये गए जिसके अनुसार अमरीका भारत को युरेनियम-235 देने की बात कही उस समय पूरी मीडिया ने मनमोहन सिंह की तारीफों  के पुल बांधे और इस डील को भारत के लिए बड़ी उपलब्धि बतायापर पीछे की कहानी छुपा ली गयी l  आप ही बताइए जो अमरीका 1998 के परमाणु परीक्षणों के बाद भारत पर कड़े प्रतिबंध लगाता है वो भारत पर इतना उदार कैसे हो गया की सबसे कीमती रेडियोएक्टिव पदार्थ  जिससे परमाणु हथियार बनाये जा सकते हैं,एकाएक भारत को बेचने के लिए तैयार हो गया दरअसल इसके पीछे की कहानी यह है की इस युरेनियम-235 के बदले मनमोहन सिंह ने यह पूरा थोरियम भण्डार अमरीका को बेच दिया जिसका मूल्य अमरीका द्वारा दिए गए  युरेनियम से लाखो गुना ज्यादा है आपको याद होगा की इस डील के लिए मनमोहन सिंह ने UPA-1 सरकार को दांव पर लगा दिया थाफिर संसद में वोटिंग के समय सांसदों को खरीद कर अपनी सरकार बचायी थी यह उसी कड़ी का एक हिस्सा है l  थोरियम का भण्डार भारत में उसी जगह पर है जिसे हम रामसेतु’ कहते हैंयह रामसेतु भगवान राम ने लाखों वर्ष पूर्व बनाया थाक्योंकि यह मामला हिन्दुओं की धार्मिक आस्था से जुड़ा था इसलिए मनमोहन सरकार ने इसे तोड़ने के बड़े बहाने  बनाये। जिसमें से एक बहाना यह था की रामसेतु तोड़ने से भारत की समय और धन की बचत होगीजबकि यह नहीं बताया गया की इससे भारत को लाखों करोड़ की चपत लगेगी क्योंकि उसमें मनमोहन सिंहकांग्रेस और उसके सहयोगी पार्टी डीएमके का  निजी स्वार्थ था l  भारत अमरीका के बीच डील ये हुई थी की रामसेतु तोड़कर उसमें से थोरियम निकालकर अमरीका भिजवाना था तथा जिस कंपनी को यह थोरियम निकालने का ठेका दिया जाना था वो डीएमके के सदस्य टी आर बालू की थी। अभी यह मामला सुप्रीमकोर्ट में लंबित है l  इस डील को अंजाम देने के लिए मनमोहन (कांग्रेस) सरकार भगवान राम का अस्तित्व नकारने का पूरा प्रयास कर रही हैओने शपथपत्रों में रामायण को काल्पनिक और भगवान राम को मात्र एक पात्र’ बताती है और सरकार की कोशिश है की ये जल्द से  जल्द टूट जायेजबकि अमरीकी अन्तरिक्ष एजेंसी नासा ने रामसेतु की पुष्टि अपनी रिपोर्ट में की है l  अतः यह जान लीजिये की अमरीका कोई मूर्ख नहीं है जिसे एकाएक भारत को समृद्ध बनाने की धुन सवार हो गयी हैयदि अमरीका 10 रुपये की चीज़ किसी को देगा तो  उससे 100 रुपये का फायदा लेगाऔर इस काम को करने के लिए उन्होंने अपना दलाल भारत में बिठाया हुआ है जिसका नाम है "मनमोहन सिंह" l  अब केवल कैग रिपोर्ट का इंतज़ार हैजो कुछ दिनों में इस घोटाले की पुष्टि कर  देगी…. यदि 1.86 लाख करोड़ का कोयला घोटाला महाघोटाला है तो 48 लाख करोड़ के घोटाले को क्या कहेंगे आप ही बताइए।
हम सभी हिन्दू भाइयों को इस बात को समझना होगा की यदि आज राम सेतु तोड़ा गया तो ये सिर्फ एक ऐतिहासिक संरचना को तोड़ना नहीं होगा बल्कि हिंदुओं के धार्मिक आस्था पर चोट होगी॥ कहते हैं की इतिहास स्वयं को दोहराता है रामसेतु को तोड़ना ठीक उसी प्रकार है जैसे बाबर ने रामलला के मंदिर को तोड़ा था अंतर सिर्फ इतना ही है की इस बार बाबर के रूप मे “सोनिया’,”राहुल”,”दिग्विजय” और “चिदम्बरम” जैसे कांग्रेसियों की फौज है और राम मंदिर की जगह है रामसेतु......

"आशुतोष नाथ तिवारी"

स्रोत: APJकलाम साहब का इंटरव्यू,कांग्रेस का हलफनामा,अंतर्जाल सूचनाएँ ,गूगल ब्लाग्स

being hindu 










मंगलवार, 5 फ़रवरी 2013

अयोध्या एवं राम जन्मभूमि का इतिहास -6(History of Ayodhya and Ram Temple-6)


नबाब सहादत अली के समय जन्मभूमि के रक्षार्थ युद्ध: अमेठी के राजा गुरुदत्त सिंह और पिपरपुर के राजकुमार सिंह के नेतृत्व मे बाबरी ढांचे पर पुनः पाच आक्रमण किया गया और जन्मभूमिपर अधिकार हो गया । यह युद्ध सुल्तानपुर गजेटियर के आधार पर 1763 ईसवी मे हुआ था।  मगर हर बार की तरह मुह की खाने के बाद अपेक्षाकृत ज्यादा बड़ी और संगठित शाही सेना जन्मभूमि को अपने अधिकार मे ले लेती थी। मगर इसके बाद भी आस पास के हिंदुओं ने अगले कई सालो तक जन्मभूमि के रक्षार्थ  युद्ध जारी रखा । इस रोज रोज के आक्रमण से जन्मभूमि पर कब्जा बनाए रखने के लिए मुगल सेना की काफी क्षति हो रही थी और इसका बाबर की तरह नबाब सहादत ली ने भी हिंदुओं और मुसलमानो को एक ही स्थान पर इबादत और पुजा की छूट दे दी । तब जा के कुछ हद तक उसने नुकसान पर काबू पाया 
लखनऊ गजेटियर मे कर्नल हंट लिखता है की
लगातार हिंदुओं के हमले से ऊबकर नबाब ने हिंदुओं और मुसलमानो को एक साथ नमाज पढ़ने और भजन करने की इजाजज्त दे दी ,तब जा के झगड़ा शांत हुआ ।नबाब सहादत अली के लखनऊ की मसनद पर बैठने से लेकर पाँच वर्ष तक लगातार हिंदुओं के बाबरी मस्जिद पर दखलयाबो हासिल करने के लिए पाँच हमले हुए।
“लखनऊ गजेटियर पृष्ठ 62”
नासिरुद्दीन हैदर  के समय मे तीन आक्रमण :मकरही के राजा के नेतृत्व में जन्मभूमि को पुनः अपने रूप मे लाने के लिए हिंदुओं के तीन आक्रमण हुये । तीसरे आक्रमण मे हिन्दू संगठित थे अबकी बार डटकर नबाबी सेना का सामना हुआ 8वें दिन हिंदुओं की शक्ति क्षीण होने लगी,जन्मभूमि के मैदान मे हिन्दू और मुसलमानो की लाशों का ढेर लग गया । शाही सेना के सैनिक अधिक संख्या मे मारे गये। इस संग्राम मे भीती,हंसवर,,मकरही,खजुरहट,दीयरा अमेठी के राजा गुरुदत्त सिंह आदि सम्मलित थे। शाही सेना इन्हे पछाड़ती हुई  हनुमानगढ़ी  तक ले गयी। यहाँ चिमटाधारी साधुओं की सेना हिंदुओं से आ मिली और। इस युद्ध मे शाही सेना के चिथड़े उड गये  और उसे रौंदते हुए हिंदुओं ने जन्मभूमि पर कब्जा कर लिया। मगर हर बार की तरह कुछ दिनो के बाद बड़ी शाही सेना ने पुनः जन्मभूमि पर अधिकार कर लिया।

पियर्सन बहराइच गजेटियर मे लिखता है
“जन्मभूमि पर अधिकार करने के लिए नवाब नसीरुद्दीन हैदर के समय मे मकरही के ताल्लुकेदार के साथ हिंदुओं की एक जबरदस्त भीड़ ने तीन बार हमला किया। आखिरी हमले मे शाही सेना के पाँव उखड़ गए और वह मैदान से भाग खड़ी हुई । किन्तु तीसरे दिन आने वाली जबरदस्त शाही हुक्म से लड़कर हिन्दू बुरी तरह हार गये और उनके हाथ से जन्मभूमि निकल गयी । “बहराइच गजेटियर पृष्ठ 73”

नबाब वाजीद अली के समय दो आक्रमण: नाबाब वाजीद आली शाह के समय के समय मे पुनः हिंदुओं ने जन्मभूमि के उद्धारार्थ आक्रमण किया । फैजाबाद गजेटियर मे कनिंघम के अनुसार इसबार शाही सेना किनारे थी और हिंदुओं और धर्मांतरित कराये गए हिंदुओं(नए नए बने मुसलमानो) को आपस मे लड़ कर निपटारा करने की छूट दे दी गयी थी। इस संग्राम मे बहुत ही भयंकर खूनखराबा हुआ ।दो दिन और रात होने वाले इस भयंकर युद्ध मे मुसलमान बुरी तरह पराजित हुए। फैजाबाद गजेटियर के अनुसार क्रुद्ध हिंदुओं की भीड़ ने उनके मकान तोड़ डाले कबरे तोड़ फोड़ कर बर्बाद कर डाली मस्जिदों को मिसमर करने लगे यहाँ तक की हिंदुओं ने मुर्गियों तक को जिंदा नहीं छोड़ा मगर हिन्दू भीड़ ने मुसलमान स्त्रियॉं और बच्चों को कोई हानि नहीं पहुचाई। मगर चूकी अब अङ्ग्रेज़ी प्रभाव हिंदुस्थान मे था अतः शाही सेना शुरू मे चुप थी अयोध्या मे प्रलय मचा हुआ था मुसलमान अयोध्या छोड़कर अपनी जान ले कर भाग निकले थे ।,इतिहासकार कनिंघम लिखता है की ये अयोध्या का सबसे  बड़ा हिन्दू मुस्लिम बलवा था। मुसलमानो की अत्यंत दुर्दशा और हार देखते हुए शाही सेना ने हस्तक्षेप किया जिसमे अब ज्यादा अंग्रेज़ थे। सारे शहर मे कर्फ़्यू आर्डर कर दिया गया । उस समय अयोध्या के राजा मानसिंह  और टिकैतराय ने नाबाब वाजीद आली शाह से कहकर हिंदुओं को फिर चबूतरा वापस दिलवाया । हिंदुओं ने अपना सपना पूरा किया और औरंगजेब द्वारा विध्वंस किए गए चबूतरे को फिर वापस बनाया । चबूतरे पर तीन फीट ऊँची खस की टाट से एक छोटा सा मंदिर बनवा लिया ॥जिसमे पुनः रामलला की स्थापना की गयी।
कुछ जेहादी मुल्लाओं को ये बात स्वीकार नहीं हुई उन्होने नबाब से जाके इस बात की शिकायत की नाबाबों ने एक बार हिंदुओं का क्रोध और राजनीतिक स्थिति देखते हुए हस कर एक कूटनीतिक उत्तर दिया की
हम इश्क के बंदे हैं मजहब से नहीं वाकिफ। गर काबा हुआ तो क्या?बुतखाना हुआ तो क्या??

नबाब के इस कूटनीति को अंग्रेज़ो का भी साथ मिला । मगर नबाब के इस निर्णय से जेहाद के लिए प्रतिबद्ध मौलवी आली आमिर सहमत नहीं हुआ ॥
मौलवी अली आमिर द्वारा जेहाद: नबाब के उक्त निर्णय पर अमेठी राज्य के पीर मौलवी अमीर अली ने जेहाद करने के लिए मुसलमानो को संगठित किया और जन्मभूमि पर आक्रमण करने के लिए कुछ किया। रास्ते मे भीती के राजकुमार जयदत्त सिंह से रौनाही के पास उसे रोककर घोर संग्राम किया और उसकी जेहादी सेना समेत उसे समाप्त कर दिया।
मदीतुल औलिया मे लिखा है की
“मौलवी साहब ने जुमे की नमाज पढ़ी।तकरीबन 170 आदमी जेहाद मे लेकर रवाना हुए । सन 1721 हिजरी 1772 हिजरी बकायदा मोकिद हुआ जेहाद का नाम सुनकर सैकड़ो मुसलमान शरीर जेहाद हुए। तकरीबन दो हजार की जमात रही होगी रौनही के पास जंग करते हुए शहीद हुए”  मदीतुल औलिया पृष्ठ 55

लेख के अगले अगले अंक मे पढ़िये किस प्रकार हिंदुस्थान के मुसलमानो ने स्वयं आगे  आ के रामजन्मभूमि पर पुनः मंदिर बनवाने का प्रयास किया

बुधवार, 9 जनवरी 2013

बलात्कार : हिन्दुत्व के संस्कारों का अवमूल्यन या पाश्चात्य प्रभाव मे इस्लामी उद्दीपन



कई दिनो से पूरे देश मे बलात्कार के खिलाफ माहौल बना हुआ है (या बनाया गया है इसके लिए यहाँ क्लिक करे)। बलात्कार के खिलाफ माहौल बनाया गया हो या माहौल स्वयंस्फूर्त हिन्दुस्थानी जनता की सरकारी निकम्मेपन के खिलाफ विषादयुक्त अभिव्यक्ति हो दोनों परिस्थितियों मे एक बात पर बिलकुल ही संशय नहीं है की सामाजिक मर्यादाएं टूट रही हैं। इस पर एक विस्तृत परिचर्चा की आवश्यकता होगी । बलात्कार जैसे जघन्य कृत्य का किसी भी प्रकार से समर्थन या आरोपी का बचाव खुद को बलात्कारी की श्रेणी मे खड़ा करने सदृश्य होगा॥
मगर एक प्रश्न जिसपर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है वो की  मर्यादा पुरुषोत्तम राम के देश मे मर्यादा का हनन क्यू हो रहा है क्या तथाकथित सभ्य समाज ने अपनी मान्यताएँ बदल दी हैं या मान्यताएं टूट रही हैं। हालाँकि व्यभिचार हर समय कही न कही न्यूनाधिक मात्र मे उपस्थित रहा है फिर भी  यदि भारतीय परिवेश मे देखें तो मुगल काल मे इस प्रथा का कई कारणो से बहुत प्रचार हुआ इसका ज्वलंत स्तम्भ आगरे का मीना बाजार है जहाँ तथाकथित महान राजा अकबर ने सिर्फ महिलाओं के लिए एक बाजार बनवाया था बाजार पर उसकी सर्वदा नजर रहती और कोई खूबसूरत हिन्दू कन्या दिखते ही वो उसे अपने हरम मे रखने के लिए उसका शिकार करने निकाल पड़ता ॥ इसी मुगलकालीन खौफ से हिन्दू बहने अपन शील बचाने हेतु जौहर(समूहिक रूप से आत्मदाह) तक करने लगी ।
धीरे धीरे अंग्रेज़ आए और जैसा की उन्होने सर्वदा से नारी को एक उपभोग की वस्तु समझा है उन्होने मुगलो के क्रम को आधुनिकता का चोला पहनाते हुए नारी का मतलब “उपभोग और यौन इच्छा की पूर्ति की एक वस्तु”  के रूप मे प्रचारित किया वही इस्लामिक परिभाषा मे नारी “बच्चे पैदा करने की मशीन” से ज्यादा कुछ नहीं होती।
मगर अब ये प्रश्न उठता है की मुगल चले गए ,अंग्रेज़ चले गए फिर भी ये पाशविकता क्यू?? और दिल्ली के दामिनी(बदला हुआ नाम) बलात्कार एवं हत्याकांड मे हालाँकि बर्बरता की सीमा पार करते एक लहूलुहान महिला से  दो बार बलात्कार करने वाला और उसके यौनांगों मे लोहे की राड डालने वाला आरोपी मुस्लिम था फिर भी उसके साथ बलात्कार करने वाले 5 आरोपी हिन्दू थे ॥ मेरा प्रश्न यही है की हिन्दू बहुल हिंदुस्तान मे हिंदुओं मे ये पाशविकता कहाँ से आ रही है ? ये वही हिन्दू धर्म है जिसमे नारी को शक्ति का रूप माना जाता है “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता".. 
दरअसल समस्या भी यही से शुरू होती है मेरे समझ से नर और मादा मे स्वाभाविक लैंगिक आकर्षण होता है चाहे वो जानवर हो या मनुष्य तो फिर हम जानवरो से पृथक कैसे हुए। जानवरो से पृथक करते हैं हमारे संस्कार । संस्कार कहाँ से हमे मिलते हैं तो संस्कार हमे धर्म से मिलते हैं चाहे वो हिन्दू हो मुसलमान हो ईसाई ,पारसी या जैन हो ॥ जैसे जैसे धर्म का लोप होता है उस धर्म के संस्कारों का भी लोप होता है । और इसी के बाद मनुष्य अपनी मर्यादा भूलकर एक श्रेणी नीचे खड़ा हो जाता है और जानवरों की भाति यहाँ वहाँ भटकने लगता है । अगर आंकड़ों पर गौर करे तो पिछले दो दसक मे यौनजनित अपराधों की बाढ़ सी आ गयी है। तो क्या बदलाव आया हमारे समाज मे इन दो दसको मे?? यदि आप मैकाले को जानते हो तो उनकी दो सौ साल पहले  ब्रिटेन की संसद मे हिंदुस्थान के खिलाफ बनाई गयी योजना का कार्यान्वयन हुआ है । जैसा की पहले भी मैंने कहा है की अंग्रेज़ नारी को उपभोग की वस्तु से ज्यादा कुछ नहीं समझते अपने व्यापारिक और धार्मिक हितो के लिए यूरोप ने एक कार्यक्रम चलाया  जिसके दो लक्ष्य थे प्रथम –हिंदुस्थान को ईसाई राज्य बनाना दूसरा-हिंदुस्थान से हिन्दुत्व की अवधारणा को खतम करना। इसी के प्रथम कड़ी के तहत उन्होने बौद्धिक रूप से अंग्रेज़ हिंदूस्थानियों का एक वर्ग तैयार किया और उनके हाथ मे सत्ता सौप दी खुद वापस लौट गए । उनके इस कार्यक्रम मे इस्लामिक कठमुल्लों,कमुनिस्टो एवं हिन्दू धर्म के कैंसर सेकुलर गद्दारो ने खाद पानी का प्रबंध किया। इसी कार्यक्रम के अंतर्गत धीरे धीरे नारी को एक उपभोग की वस्तु के रूप मे समाज मे अवस्थित किए जाने लगा,ठीक उसी समानान्तर क्रम मे सुनुयोजित तरीके से हिन्दू धर्म संस्कारों का ह्रास किए जाने लगा ।
ये वही हिंदुस्थान है जिसकी मिट्टी मे कभी रानी लक्ष्मीबाई जैसी वीरांगना ने जन्म लिया और नारीशक्ति का अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत किया मगर आज परिस्थितियाँ बदली हुई है आज हिंदुस्थान की नारी सती सावित्री और लक्ष्मीबाई जैसे विशेषणों से अपने आप को अपमानित महसूस करती है और मेडोना और स्पाइस गर्ल उसकी पसंद बन गए हैं। आज का हिन्दुस्तानी युवा भगत सिंह और सावरकर को भूल के माइकल जैकसन,रिकी मार्टिन,शाहरुख खान मे अपना आदर्श ढूँढता है। उसे ये बताया गया की वेदों की ऋचाए बकवास है और माइकल जैकसन के गाने जीवन का लक्ष्य। सेक्स और अतृप्त लैंगिक इच्छाओं की की पाशविक रूप से पूर्ति करने का उद्देश समाज की नसो मे टेलीविज़न और संचार माध्यमों से भरा जा रहा है फिर हम कहते हैं की बलात्कार क्यू हो रहा है ??
कुछ तथाकथित बे सिर पैर की बाते करने वाले बुद्धिजीवी ये बकवास कर सकते हैं की क्या समस्या है पाश्चात्य सभ्यता मे वो भी एक जीवन पद्धति है ?? जी हाँ मुझे कोई समस्या नहीं मगर हर पद्धति की कुछ अच्छाइयों के साथ साथ बुराइयाँ भी नकारात्मक पार्श्व प्रभाव के रूप मे आती हैं। हमने यूरोप से नग्नता ले ली मगर हम भूल गए की यूरोप मे शिशुमंदिरों की तरह गर्भपात केंद्र भी खुले हैं। ये उनकी सभ्यता है की एक व्यक्ति कई महिलाओं के साथ सेक्स संबंध रखता है और इसे कोई बहुत बुरा नहीं कहता उनकी सभ्यता मे खुलापन होने के कारण सेक्स आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किसी महिला का आसानी से मिल जाना समान्य बात है। महिलाएं भी एक से ज्यादा पुरुषों के साथ संबंध रख सकती है । हमारे हिंदुस्थान मे सेक्स आवश्यकताओं का उद्दीपन या आवश्यकताओं को पाशविक रूप से उभरने के सभी साधन यूरोप से ला के भर दिये गए मगर पाशविक सेक्स आवश्यकताओं की पूर्ति का कोई तरीका नहीं है क्यूकी यहाँ यूरोप की तरह हर चौराहे पर लड़की नहीं मिल सकती सेक्स के लिए , न ही यहाँ यूरोप की तरह जानवरो के साथ सेक्स करना स्वीकार्य है और जब एक बार मनुष्य मनुष्यता को त्याग कर जानवर बन गया फिर उसे माँ,बहन,बेटी या राह चलती लड़की एक उपभोग की वस्तु से ज्यादा कुछ नहीं नजर आएगी और उसकी परिनीति होती है वीभत्स कुकर्म बलात्कार के रूप मे वस्तुतः ये असर है अधकचरी सभ्यता का हम नंगे घूमना चाहते हैं मगर कोई हमारी ओर न देखें ,हमने हर चौराहे पर दारू के अड्डे बना दिये मगर कोई भी गाड़ी शराब पी के न चलाये ऐसा चाहते हैं।
पाश्चात्य सभ्यता ने जो नग्नता परोसी है उसमे हर नौजवान के केन्द्रबिन्दु मे सेक्स होता जा रहा है और उसकी परिधि मे है भोग्या बना दी गयी नारी का वक्र और भूगोल । किसी भी एक घटना के लिए हम सिर्फ एक ही विचार या परिस्थिति को कारण नहीं बना सकते उसी प्रकार बलात्कार के लिए भी कई कारण उत्तरदाई है।उसमे धर्म से विमुख ,चरित्र से गिरे हुए, पथभ्रष्ट किए जा रहे भारतीय युवको का आत्मनियंत्रण खोना प्रमुख है। साथ ही साथ उसमे हमारी बहनो के पाश्चात्य परिधान चयन, सेक्स की इस आग मे वासना के घी का कार्य करता है। आप ही बताये एक महिला जब ऐसी जींस पहनती है जो उसके कमर के नीचे तक हो और उसमे उसके अंतःवस्त्र दिखते हो तो उस पर चरित्रहीन को तो छोड़िए समान्य व्यक्ति की क्या प्रतिक्रिया होगी? जब अंतः वस्त्रों में अंगों का बेहूदा भौड़ा प्रदर्शन एक महिला करे तो उस पर आपत्ति क्यू न की जाए? लक्ष्मणरेखा तो खिचनी ही होगी इसे नंगा नाचने वाले मोरल पुलिसिंग का नाम दे तो यही सही। मगर ये नंगा नाच जब तक चलेगा तब तक कुछ हद तक महिलाएं भी अपनी उत्तरदायित्व से नहीं बच सकती । कुछ बाते जरा खुले रूप से लिखनी यहाँ जरूरी थी ॥ जहाँ इज्जत या मर्यादा की बात होती है ,वो महिला की ओर इंगित की जाती है कारण ये है की महिला प्राकृतिक रूप से इज्जत का प्रतिनिधित्व करती है।  चाहे वो जानवरो मे हो या इन्सानो मे । इसे किसी धर्म ने नहीं बनाया है अतः शील की रक्षा के एक कदम आगे आ के कार्य करना महिलाओं का भी कर्तव्य बनता है.  चाहे वो यौनांगों का कम से कम प्रदर्शन हो या किसी वाहियात इज्जत पर हाथ डालने वाले के खिलाफ प्रतिक्रिया करना।  आज पूनम पांडे और सन्नी लियोन जैसी वेश्या हमारे बेडरूम मे टीवी के माध्यम से पहुच चुकी है और बात सभी लोग आदर्शो की कर रहे हैं। जरा इन महिलाओं को देखें अब महिला आयोग और बुद्धिजीवी कहेंगे की मेरी नजर खराब है तो जी हाँ मुझे वही दिख रहा है जो ये दिखा रहे हैं । और तो और रेप का कैसे विरोध हो रहा है ये भी देखें।

हाँ मगर उसी प्रकार से युवको के लिए भी सीमा रेखा का निर्धारण करना होगा क्यूकी एक सत्य ये भी है की साड़ी पहनी हुई महिला या 2 माह की बच्ची से भी बलात्कार होता है ये इंगित करता है, पश्चिमी पाशविक मानसिकता का ॥ अभी रूस ने अमरीका के लोगो को रूसी  बच्चो को नौकर के रूप मे रखने के खिलाफ एक कानून बनाया है मूल यही है की वो लोग इतने पाशविक हो गए हैं की बच्चो को भी अपनी हवसपूर्ति का साधन बनाने लगे हैं वही हमारे समाज मे भी लाया जा रहा है यूरोपियन संस्कृति के साथ॥ 
 आज कल के युवा अमरीकन मानसिकता के साथ इंडिया गेट पर मोमबत्ती जलाके शाम को पब मे रात भर के लिए गर्लफ्रेंड ढूँढते हैं।  इस प्रकार हम एकतरफा महिला को दोष देकर अपने जबाबदेही से नहीं बच सकते ।एक उदाहरण देता हूँ जो की समान्य व्यक्तियों पर लागू है ढोंगी आदर्शवादियों और जानवरो पर नहीं । जब हम एक देशभक्ति सिनेमा देखते हैं तो देशभक्ति के भाव आता है मन मे, जब एक दुखद दृश्य देखते हैं तो दुख का भाव ,जब हसी देखते हैं तो हास्य का भाव आता है और कभी कभी वो तात्क्षणिक रूप से हमारे जीवन मे परिलक्षित होता है जैसे एक दुखद दृश्य के बाद रोते हुए लोग या एक हास्य के बाद ठहाके लगाते लोग। तो रोज नए नए विज्ञापनो से गानो से पिक्चरों से रंडीबाजी (यही उचित शब्द है) देखते देखते क्या इसका कोई अनुकरण नहीं करेगा॥  
डियो लगाओ लड़की आप के बाहों मे 
,चाकलेट खाओ लड़की पटाओ,बाइक लाओ लड़की पटाओ,साबुन बेचने के लिए लड़की को नंगा करो ,कंडोम बेचने के लिए लड़की को नंगा करो मतलब हर जगह महिला को नंगा करके हिंदुस्थान की नयी पीढ़ी को मानसिक रूप से बीमार सेक्स रोगी बना दो। हर विज्ञापन मे सेक्स परोसते लोग। जरा सोचिए ये सब जब एक बच्चा जन्म से 16 साल तक लगातार रोज रोज देखेगा तो होश संभालने के बाद अपनी सेक्स की आवश्यकता पूर्ति कैसे करेगा? जी हाँ वो एक पढ़ा लिखा मानसिक रूप से बीमार रोगी बन जाता है और जब संदर्भ हमारे समाज का हो जो न तो पूरी तरह हिंदुस्थानी विचारधारा छोड़ पाया न ही पूरी तरह अंग्रेज़ बन पाया, तो स्थिति और भी भयावह। एक विवेकानंद ने अकेले शिकागो ने हिंदुस्थान का झण्डा सर्वोपरि रक्खा क्यूकी उनके आदर्श थी वेद की ऋचाएं,गीता के श्लोक, और रामचरितमानस की चौपाइयाँ ॥ आज के युवाओं के कुछ आदर्श मंत्र जो दिन मे कई बार दोहराए जाते हैं और कंठस्थ है, 
कभी मेरे साथ एक रात गुजार, मै हूँ तंदूरी मुर्गी यार गटकाले मुझको अल्कोहल से , तू चीज बड़ी है मस्त मस्त,चोली के पीछे क्या है,शीला की जवानी, मै शराबी  मै शराबी .....अब जब चोली के पीछे पीछे गाते गाते लाखो लोगो मे से एक ने इस गाने को प्रयोगात्मक रूप दे दिया तो हो गया हंगामा ॥ 
 ये सिर्फ एक बानगी भर है। आज कल टीवी चेनेल कामक्रीड़ा को भी दिखाने लगे हैं और वो हम सब मजे से देखते हैं फिर इतना हँगामा क्यू बरपा है?? जिस हिसाब से हमारे हिन्दुत्व के संस्कारो का दमन और नग्नता की आँधी चल रही है उस संदर्भ बिन्दु से देखें तो ये घटनाएँ कुछ भी नहीं हैं यहाँ तो त्राहि त्राहि होना चाहिए॥ अगर अभी कुछ बचा है वो इसलिए क्यूकी ये संस्कार धीरे धीरे आते हैं और धीरे धीरे ही जाते हैं उल्टी गिनती शुरू हो गयी है यदि हम अब भी नहीं चेते तो सिर्फ दो ही रास्ते बचते हैं पूरी तरह यूरोपियन जानवर बने और “सेक्स किसी के साथ, कभी भी, कहीं भी” को स्वीकार करे या यूरोपियन भारतीय संस्कारों का वर्णसंकर बनना है तो इंडिया गेट पर एक मोमबत्ती का कारख़ाना खुलवाने के लिए सरकार अर्जी दे दीजिये ...
हाँ एक और तरीका है जो बुद्धिजीवियों के गले न उतरे न ही तथाकथित अङ्ग्रेज़ी के गुलाम,सेकुलर और कमुनिस्ट द्रोही इसे स्वीकार कर पाये आइये एक बार फिर हिन्दुत्व की शरण मे चलते हैं कम से कम हिन्दुत्व मे शिवाजी विवेकानंद और रानीलक्ष्मीबाई के प्रमाण है न की विभिन्न  देशों की वेश्याओं को को सिरमौर बनाने के...
निर्णय आप का ॥

जय श्री राम
लेखक : आशुतोष नाथ तिवारी