शनिवार, 13 जून 2015

प्रधानमंत्री मोदी की बांग्लादेश यात्रा और सीमा समझौता(Modi Bangladesh Visit)

मित्रों पिछले दो लेखों में सीमा समझौते का इतिहास वर्तमान एवं भारत के पक्ष के बाद आगे बढ़ते हुए जान लें की बांग्लादेश के लिए क्यों जरुरी था ये समझौता:

बांग्लादेश में जब से शेख हसीना सरकार आई है वो प्रोइण्डिया(भारत के पक्ष की) सरकार मानी जाती है. यदि आप याद कर सके तो आसाम में सक्रीय उल्फा नाम के संगठन का एक समय बहुत आतंक था और वो बांग्लादेश में ट्रेनिंग कैम्प और गतिविधिया चलाता था. शेख हसीना सरकार ने उल्फा के सभी ट्रेनिंग कैम्प ध्वस्त करके उसके चीफ अरविन्द राजखोवा समेत उल्फा के सभी टाप कमांडर्स को बांग्लादेश में पकड़ कर हिन्दुस्थान के हवाले कर दिया, जिनकी गिरफ्तारियां भारत के विभिन्न सीमावर्ती क्षेत्रों से दिखाई गयी. इसके अलावा बांग्लादेश में भारतीय इन्क्लेव्स में बसने वालों मुसलमानों को बांग्लादेश सरकार कोई सुविधा नहीं देती थी क्युकी वो भारतीय सीमा में थे. इन दो मुद्दों समेत भारत के पक्ष में खड़े होने के कारण कट्टर इस्लामिक ताकते और विपक्ष की नेता बेगम खालिदा जिया ने पाकिस्तान के शह पर शेख हसीना को घेरना शुरू कर दिया था अतः इस समझौते को आधार बना कर शेख हसीना अगले चुनाव में ये कह सकेंगी की सभी भारतीय इन्क्लेव बांग्लादेश के हुए और उसमे बसने वालों को बांग्लादेश सरकार सभी सुविधाएं देगी.इस समझौते के लिए शेख हसीना मोदी की कोई भी शर्त मानने को तैयार थी. शेख हसीना के बेटे का मोदी के अगवानी में आना भविष्य के नए समीकरण का संकेत दे रहा है.
चूकी शेख हसीना इसके बदले में भारत के साथ किसी भी सीमा तक सहयोग हेतु तैयार थी अतः भारत ने कुछ और समझौते किये जो सामरिक दृष्टि से भारत को सुरक्षित करने के लिए अत्यंत आवश्यक थे. जिसमे चीन के "string of pearls" योजना के दो बंदरगाह भारत को देना था जिसका विस्तृत विवरण पिछले लेख में दिया गया है।
चीन किस हद तक बांग्लादेश में घुसा है इसका दूसरा उदाहरण इस प्रकार समझ सकते हैं की जब 2002 के लगभग भारत में शोपिंग माल कल्चर आ रहा था उस समय तक चीन ने बांग्लादेश के कई हिस्सों में अपने खर्च से बड़े बड़े शोपिंग माल्स का निर्माण करा के अपनी स्थिति मजबूत करते हुए भारत को एक तरह से बांग्लादेश से बाहर कर के,बांग्लादेश को भारत विरोधी गतिविधियों का केंद्र बना दिया था.. इन सबको ध्यान में रखते हुए मोदी ने लगभग २२ समझौते किये.. चीन का व्यापारिक आधिपत्य तोड़ने और भारतीय निर्यात को बढ़ावा देने के लिए भारत ने बांग्लादेश को 2 बिलियन डालर की क्रेडिट लाइन दी है इसके अंतर्गत भारत सरकार द्वारा निर्धारित किये क्षेत्र के सामान 2 बिलियन डालर तक बांग्लादेश को क्रेडिट अर्थात उधार पर दिए जायेंगे शर्त ये है की वो सामान भारत में बने हो। “MAKE IN INDIA” मुहीम को इससे बढ़ावा मिलेगा और 50 हजार रोजगार के अवसर तुरंत उत्पन्न हो जायेंगे. इसके साथ ही साथ हम वही सामान देंगे जिसके निर्यात में हम सक्षम हैं. मोदी ने बांग्लादेश से इस बात पर भी सहमती ले ली है की बांग्लादेश भारतीय कंपनियों के लिए SEZ बनाने के लिए जमीन देगा और उस SEZ में सिर्फ भारतीय कम्पनियाँ ही अपनी यूनिट लगा सकती हैं. इस SEZ के माध्यम से चीन क बढ़ते प्रभाव को नियंत्रित करने की दिशा में एक कदम आगे और भारत बढेगा।।
एक अन्य समझौते के तहत भारत की जीवन बिमा कंपनी LIC(भारतीय जीवन बीमा निगम) को बांग्लादेश में व्यापार की अनुमति मिल गयी है अर्थात अब LIC अपना व्यापार पडोसी देश में भी कर सकेगी.
भारत के दृष्टि से एक अन्य महत्त्वपूर्ण बात जिसपर समझौता हुआ है वह है कोलकत्ता ढाका अगरतला बस सेवा और ढाका शिलोंग गुवाहाटी बस सेवा: पूर्व में 1650 किलोमीटर की दुर्गम एवं पहाड़ी दूरी तय करके दो दिन में कोलकत्ता से अगरतला पहुचना होता था अब इस बस सेवा से दुरी लगभग 500 किलोमीटर कम हो जाएगी तथा रास्ते भी अपेक्षाकृत सुगम होंगे. और अब 14-16 घंटे में यात्री कोलकत्ता से अगरतल्ला पहुच सकेंगे.इसका सीधा असर व्यापार और दैनिक गतिविधियों पर पड़ेगा. भारतीय संसाधनों और समय की बचत होगी..
यदि समेकित रूप से भारत के पक्ष से इसका विश्लेषण किया जाए तो ये दौरा नरेंद्र मोदी के किसी भी अन्य दौरे से ज्यादा सफल है क्युकी बांग्लादेश में होने वाली हर गतिविधि भारत की आंतरिक स्थिति पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रभाव डालती है. भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस शानदार उपलब्धी हेतु बधाइयाँ एवं शुभकामनाएं..


आशुतोष की कलम से

बांग्लादेश दौरे में नरेंद्र मोदी ने तोड़ी चीन की मोतियों की माला (string_of_pearls )


#string_of_pearls
 #बांग्लादेश #चिट्टागोंग #मोंगला 
मित्रों आप से एक ऐसी सूचना साझा कर रहा हूँ जिसे हर भारतीय को जानना ही चाहिए। मोदी के बांग्लादेश से किये किसी भी समझौते के समझने से पहले चीन के बांग्लादेश और भारत के पडोसी राज्यों में भारत के घेरने की रणनीति के बारे में समझना अति आवश्यक है.
भारत को घेरते हुए चीन ने सभी पडोसी देशो में अपने बंदरगाह बना दिए थे और इन बंदरगाहो को भारत विरोधी गतिविधियों का अड्डा.. 

नक़्शे में दिखाए गए पडोसी देशो में बनाये गए string of pearls से चीन ने सागर में भारत को घेर लिया था।। इनमे प्रमुख बन्दरगाह निम्न हैं।
श्रीलंका का हम्बनटोटा बंदरगाह
पाकिस्तान का ग्वादर बंदरगाह
बांग्लादेश में चिट्टागोंग और मोंगला दो बंदरगाह
मालदीव में मारा बंदरगाह
म्यांमार में क्यौक्पयु बंदरगाह।
चाइना इन्हें string of Pearls “मोतियों की मालाकहता था. भारत की दृष्टि से चिट्टागोंग और मोंगला पोर्ट अत्यंत संवेदनशील थे।इन दोनों को चीन ने बांग्लादेश में बनाया था और वहां से अपनी गतिविधिया चलाता रहता था. मोदी ने सीमा समझौते के साथ ये समझौता किया की चिट्टागोंग और मोंगला पोर्ट अब भारत के उपयोग के लिए खोले जायेंगे और अब चिट्टागोंग और मोंगला पोर्ट भारत की गतिविधियों हेतु उपलब्ध हैं. मतलब चीन की string of pearls के दो मोती भारत ने तोड़ कर "श्रीलंका से बांग्लादेश तक" सागर में खुद को काफी हद तक सुरक्षित कर लिया।। इसमें सबसा बड़ा झटका चीन को लगा है जिन बंदरगाहों को बनाकर उनसे वो भारत को घेरना चाहता था अब उन बंदरगाहों से भारत अपनी गतिविधियाँ चलाएगा और करोडो डालर खर्च करने के बाद चीन अब हाथ मल रहा है उसके हाथ कुछ नहीं आया ।
जो लोग रेत में सर डाले शुतुरमुर्ग की तरह मोदी के बिदेश दौरों और बांगलादेश से सीमा समझौते की आलोचना में लगे थे,क्या कभी इस बिंदु पर ध्यान दिया?? शायद पूर्व में ध्यान दिया होता तो चीन से हारे नहीं होते..UPA 1 चीन समर्थक कमुनिष्ट बैसाखी पर था अतः उन्होंने कुछ नहीं किया UPA2 घोटालो में व्यस्त था तो उन्होनें कुछ नहीं किया।अब मोदी चीन के चक्रव्यूह को तोड़ रहे हैं तो इन सभी द्रोहियों को समस्या हो रही है। एक व्यक्ति भारत को विश्व में स्थापित कर रहा है। सीमाओं को सुरक्षित कर रहा है, कम से कम उसका समर्थन नहीं तो बेकार विरोध भी मत करें।
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आशुतोष की कलम से



नरेंद्र मोदी की बांग्लादेश यात्रा और भारत बांग्लादेश सीमा समझौता (indo bangladesh border agreement)

#भारत_बांग्लादेश_सीमासमझौता  
नरेद्र मोदी का बांग्लादेश दौरा,ऐतिहासिक सीमा समझौता- इतिहास के पन्नो को टटोले तो बांग्लादेश की किस्मत को मुग़ल काल के राजाओं ने शतरंज के खेल की बाजियों में सिमित कर के रख दिया था.हकीकत ये है की मुगलकाल में एक रियासत थी कूचबिहारऔर उसका सीमावर्ती राज्य था रंगपुर. कूचबिहार का राजा और रंगपुर का नबाब दोनों शतरंज के खेल के शौक़ीन थे. जब भी कूचबिहारके राजा और रंगपुर के नबाब में शतरंज की बाजी लगती वो दांव पर अपने अपने रियासत के एक गांव लगाते थे. कई सालो बाद इस शतरंज के खेल ने उन रियासतों का भूगोल बदल के रख दिया. अब कूचबिहारके राजा द्वारा जीते गए कई गाँव रंगपुर की सीमा थे और रंगपुर के नबाब द्वारा जीते गए कई गाँव कूचबिहारकी सीमा में थे.

जब भारत आजाद हुआ तो कूचबिहारभारत में और रंगपुर पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में शामिल हो गया. कालांतर में हिन्दुस्थान के सहयोग से बांग्लादेश बना और भारत बांग्लादेश सीमा का निर्धारण हुआ. अब समस्या पुनः उसी प्रकार रह गयी की रंगपुर (जो बांग्लादेश के हिस्से में आया ) के राजा द्वारा जिते हुए गांव जिन पर बांग्लादेश का अधिकार था वो गाँव भारत की सीमा के अन्दर आ गए और वो गाँव चारो ओर से भारत से घिरे थे.इन्हें वर्तमान में बांग्लादेशी इन्क्लेवकहा गया. ठीक इसी प्रकार कूचविहार(जो भारत के हिस्से में आया ) के राजा द्वारा जीते गांव जिनपर भारत का अधिकार था, वो बांग्लादेश की सीमा के अन्दर आ गए और चारो ओर से वो बांग्लादेशी गांवों से घिर गए थे.बांग्लादेश की सीमा के अन्दर इन भारतीय अधिकार के क्षेत्रों को भारतीय इन्क्लेवकहा गया . जबसे बांग्लादेश बना सीमा निर्धारण में दोनों तरफ के ये गाँव समस्या बने हुए थे इसलिए भारत बांग्लादेश बार्डर पर उस क्षेत्र में फेंसिंग(बाड़ लगाने का कार्य) हो नहीं पाता था और सीमा को PORAS BORDER(छिद्रित सीमा) कहा जाता था. अब न तो भारत के लिए संभव था की बांग्लादेश से चारो ओर से घिरे हुए भारतीय इन्क्लेवमें सड़क बिजली पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं भी पंहुचा पाए और बांग्लादेश इस नाम पर उन क्षेत्रों में कुछ नहीं कर सकता था की वो भारत के क्षेत्र हैं. ठीक इसी प्रकार बांग्लादेश के लिए संभव नहीं था की भारत से चारो ओर से घिरे हुए बांग्लादेशी इन्क्लेवमें सड़क बिजली पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं भी पंहुचा पाए और भारत इस नाम पर उन क्षेत्रों में कुछ नहीं कर सकता था क्यूकी वो बांग्लादेश के अधिकार क्षेत्र हैं।
यहीं से घुसपैठ और सीमा पर गोलाबारी का क्रम शुरू होता था. भारत के क्षेत्र में जो बांग्लादेशी इन्क्लेवथे उन में न तो बिजली थी न सडक न पानी न पुलिस न कानून. सारे अवैध धंधे और आतंकवाद के अड्डे भारत की सीमा में चल रहे हैं और भारतीय पुलिस और सेना सामने देखते हुए हाथ पर हाथ धरे हुए थी क्यूकी वो बांग्लादेशी क्षेत्र है,उसमें नहीं जाया जा सकता है. अवैध बांग्लादेशी घुसपैठीयों ने इन बांग्लादेशी इन्क्लेव को लांचिंग सेंटर बना रक्खा था और यहीं से वो घुसपैठ कर जाते थे. नकली नोटों की फैक्ट्री खुलेआम चलती थी क्युकी भारतीय सेना या प्रशासन कुछ नहीं कर सकता पडोसी देश के क्षेत्र में. उधर बांग्लादेश में भारतीय एन्क्लेव में रहने वाले भारतीयों की दुर्दशा भी थी.बांग्लादेश उन्हें अपना मानेगा नहीं और भारत वहां तक पहुच नहीं सकता हर साल इन भारतीय इन्क्लेवो एवं बंगलादेशी इन्क्लेवो के नागरिक कई सौ की संख्या में या तो बांग्लादेश राइफल्स या भारतीय सेना के हाथो,इस बार्डर के सीमांकन के संशय में मारे जाते थे. जिस किसी भी देश की सेना ने सीमा पार करते अवैध नागरिक को देखा वो उसे गोली मार देती थी और सुविधाओं के आभाव में ये नागरिक सीमा पार मज़बूरी में करते थे . इन क्षेत्रों में रहने वाले को यदि दाल या चीनी खरीदने बगल की दुकान में जाना हो तो पासपोर्ट और वीजा चाहिए...
एक तरीके से देखें तो इन सभी इन्क्लेववासियों के लिए पहचान का संकट था की वो भारत में रहते हुए भारतीय नहीं हैं और कुछ बांग्लादेश में रहते हुए बांग्लादेशी नहीं हैं. ये विवाद बांग्लादेश बनने के समय भी ऐसे ही रह गया . इंदिरा गाँधी ने शेख मुजीब के साथ सन १९७४ में ही समझौता किया मगर विभिन्न कारणों से भारत के संसद की मुहर नहीं लग पायी.मनमोहन सिंह सरकार ने इस विवाद के निपटारे के लिए इन इन्क्लेवों के अदला बदली के प्रस्ताव पर कुछ कार्य किया परन्तु पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के प्रबल विरोध,घुसपैठ रोकने के मुद्दों पर विपक्ष की असहमति एवं सोनिया गाँधी के ऊपर अतिनिर्भरता के कारण मनमोहन सिंह इतने बड़े ऐतिहासिक फैसले को चाहते हुए भी नहीं अमल कर पाए जिसे नरेंद्र मोदी के सशक्त नेतृत्व ने दोनों देशों के पक्ष और विपक्ष दोनों को साथ ले कर कर दिखाया. समझौते के अंतर्गत बांग्लादेश की सीमा पड़ने वाले सभी 111 भारतीय इन्क्लेव बांग्लादेश के हो जायेंगे और भारत की सीमा में पड़ने वाले 51 बंगलादेशी इन्क्लेव भारतीय क्षेत्र के हो जायेंगे..
भारत के लिए क्यू जरुरी था ये समझौता : भारत सरकार की सबसे बड़ी समस्या अवैध बंगलादेशी थे जो हर रोज स्थानीय सहयोग और सीमा के पोरस होने के कारण ट्रको से भर के आ जाते थे और भारत में जनसँख्या असंतुलन पैदा कर रहे थे. मोदी ने चुनावों में भी ये मुद्दा उठाया था. अब भारत सरकार के लिए सीमांकन बिलकुल स्पष्ट हो गया और इन 51 इन्क्लेवों में चलने वाले आतंवाद के अड्डे, घुसपैठ के सेंटर,नकली नोट की फैक्ट्री को भारतीय सेना घुस कर आसानी से बंद करा सकती है और हर साल होंने वाली लाखों बांग्लादेशी घुसपैठ ख़तम हो जाएगी. पश्चिम बंगाल में बांग्लादेशी आतंकियों का सफाया अब भारत सरकार के हाथ में होगा.अब ऐसा संभव नहीं की कोई भारतीय क्षेत्र में बम फोड़कर, मर्डर,लूट या बलात्कार करके बगल के गांव में भाग जाए और पूरी भारतीय सेना और सुरक्षा एजेंसिया हाथ पे हाथ धरे रहें क्यूकी वो बांग्लादेशी इन्क्लेव में भाग गया है..शायद इसीलिए इस समझौते को बर्लिन की दिवार गिरनेजैसा माना जा रहा है और वास्तव में ये कहीं उससे भी बड़ा समझौता है.. कई अपरिपक्व आलोचक आलोचना का मुद्दा भारतीय इन्क्लेव के क्षेत्र को बना रहे हैं की भारत को कम भूमि मिली परन्तु एक तथ्य ये भी है की सामरिक दृष्टी से भारत अत्यंत ही शक्तिशाली होगा. पूर्व में कई सरकारों ने सीमा पर भूमि के छोटे स्तर पर कई लेन-देन सीमा पर किये समझौते के बदले ही बांग्लादेश ने चीन द्वारा बनाये गये दो बंदरगाह भारत को सौप दिए जो की सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।
आशुतोष की कलम से

अगले लेख में: बांग्लादेश के लिए क्यों जरुरी था ये समझौता और भारत को अपेक्षाकृत कम जमीन मिलने की भरपाई और किस प्रकार से की गई है ।