सोमवार, 17 अप्रैल 2017

गंगा अरबी तहजीब की सहिष्णुता और बिजनौर का शिव मंदिर (Dispute in Bijnor over loudspeaker)

मुसलमान,हिन्दू,सेकुलर या गंगा अरबी तहजीब की भाईचारा गैंग के लोग भी पढ़े.आज सोनू निगम ने अजान से नींद खराब होने का एक बयान दिया, इस बयान का विरोध करूँ या समर्थन ये सोच ही रहा था कि इस खबर पर नजर पड़ी..
उत्तर प्रदेश के मुस्लिम बाहुल्य गांव जोगिरामपुरी बिजनौर में , एक प्राचीन शिव मंदिर पर मुसलमानों ने लाउडस्पीकर लगाने का विरोध किया, और इस पर विवाद बढ़ता गया..हिंदुओं को गांव छोड़ने का नोटिस दे दिया गया.कई लोग मकान बेचकर जाने की तैयारी में लग गए.
■■ पहला प्रश्न ये है कि यदि मस्जिद पर लाउडस्पीकर लग सकता है तो मंदिर पर क्यों नहीं??कहाँ गई सहिष्णुता?? या ये केवल हिंदुओं की ठेकेदारी है.
खैर समझौता हुआ अब जब समझौता हुआ तो मुस्लिम समाज की शर्ते देखिये..

● मुस्लिम समाज ने कहा कि मंदिर पर लाउडस्पीकर लगाने की अनुमति दी जाती है.मुस्लिम बहुल क्षेत्र में देश की कोर्ट,सरकार या व्यवस्था नहीं बल्कि स्थानीय मुसलमान निर्णय देंगे...
सोचिये अगर किसी मस्जिद के लाउडस्पीकर का विरोध, हिंदू समाज कर देता तो मीडिया और सेकुलर बिरादरी छाती कूट कूट कर मर जाती है।
● मुस्लिम बहुल गांव मे मंदिर पर लाउडस्पीकर लगाने के समझौते की दूसरी शर्त यह है कि लाउडस्पीकर का उपयोग ,हिन्दू सिर्फ त्योहारों में ही कर सकेंगे ।
इस हिसाब से अगर हिंदू बहुल एरिया में हिंदू ये मांग करने लगे कि मस्जिद के लाउडस्पीकर का प्रयोग सिर्फ मुस्लिम त्योहारों में किया जाएगा तो इसे धार्मिक रीति रिवाजों पर हमला बोलकर मीडिया के दलाल और सेकुलर विधवा विलाप शुरू कर देंगे..
● तीसरी शर्त ये है कि लाउडस्पीकर का प्रयोग सिर्फ आरती के लिए किया जाएगा,मतलब यदि हमें वहां कीर्तन करना हो तो हम लाउडस्पीकर का प्रयोग नहीं कर सकते हैं। 
यदि ऐसा ही हिन्दू बहुल क्षेत्र में , मुसलमानों के केस में कह दिया जाए की मस्जिद के लाउडस्पीकर का प्रयोग सीमित और निर्धारित कार्यों के लिए किया जाएगा तो इस देश में असहिष्णुता की सुनामी आ जाएगी...
●मुस्लिम बहुल गांव में मंदिर पर लाऊडस्पीकर लगाने की एक और शर्त लगाई गई, ईद के दौरान और नमाज के समय मंदिर उस लाउड स्पीकर का प्रयोग आरती के लिए भी नहीं कर सकता है। 
(अब अगर यही बात दूसरा पक्ष हिंदू बहुल एरिया में लागू करें और यह कहे कि मस्जिद के लाउडस्पीकर का प्रयोग नवरात्रि एवं आरती के समय नहीं किया जाएगा तो इसे अल्पसंख्यकों की स्वतंत्रता पर हमला करार दे दिया जाएगा)

इस पोस्ट पर कई लोग कह सकते हैं कि भाई मेरे यहां तो मुसलमान ऐसा नहीं करते हैं तो भरोसा रखिए आप वहां पर बहुसंख्यक होंगे....यह कोई पहला उदाहरण नहीं है. कश्मीर से आपकी पूजा ही नहीं बंद कराई गई बल्कि सन 1989 में साढ़े चार लाख कश्मीरी हिंदुओं को हत्या बलात्कार लूट जैसे कुख्यात तरीकों का उपयोग करके अपने ही घर कश्मीर घाटी से बाहर कर दिया गया और आज वह साढ़े चार लाख कश्मीरी हिन्दू, दिल्ली और जम्मू के फुटपाथ और कैंपों में ही अपने देश में शरणार्थी बने बने हुए हैं..उनकी इज्जत,घरपरिवार रिश्ते सब गंगा- अरबी तहजीब की भेंट चढ़ गए..कश्मीर ही क्यों जनाब, इस गंगा-अरबी तहजीब ने तो पश्चिम बंगाल में आपसे दुर्गा पूजा और सरस्वती पूजा करने का अधिकार भी छीन लिया है और कई जिलों में दुर्गा पूजा प्रतिबंधित है.. और अब बारी उत्तर प्रदेश की। शायद योगी सरकार इसे कुछ सालों के लिए टाल दे मगर बात प्रदेश की नहीं बात स्वीकार्यता की है .. आप जब संख्या में ज्यादा होंगे तो हमारे पास "पलायन,मॄत्यु या धर्मांतरण" किसी एक को चुनना पड़ता है...ऐसा क्यों सोचियेगा...
मेरी समस्या आपके अजान से कभी नहीं है लेकिन आपको हमेशा मेरी आरती,मेरा हवन,मेरा यज्ञ "काफिराना कुफ्र" लगता है और इस बात का इतिहास गवाह है कि जिस जगह पर आप बहुसंख्यक होते हैं, वहां पहले हमारी धार्मिक स्वतंत्रता,पूजा पाठ करने का अधिकार छीन लिया जाता है और फिर हमारे घर बार और इसके बाद भी अगर हमनेे वहाँ से पलायन नहीं किया तो बलात्कार और हत्या...विश्व केे नहीं ये सब भारत के ही उदाहरण हैं।

मैं अब सोच रहा हूँ की आज तक "अजान से मेरी नींद खराब नहीं हुई" ??क्या मैं सेकुलर हूँ??? क्या दिल्ली या गोरखपुर के किसी फुटपाथ पर बना शरणार्थी कैम्प अगले 30-40 साल बाद मेरा पता होगा???

आशुतोष की कलम से

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