मंगलवार, 11 अप्रैल 2017

मैं पाकिस्तान में भारत का जासूस था

अत्यन्त साधारण सी तस्वीर और अत्यन्त साधारण सा नाम "मोहनलाल भास्कर" शायद हममे से बहुत कम इनके बारे में जानते हों.. सन 1971 में विवाह के एक वर्ष के ही भीतर इन्हें पाकिस्तान में लाहौर से भारत के लिए जासूसी करने के अपराध में पाकिस्तानी सेना ने गिरफ्तार किया इसमें कोई शक नहीं कि मोहनलाल भास्कर रा के एक एजेंट थे और पाकिस्तान में रहकर पाकिस्तान के न्यूक्लियर प्रोग्राम की खुफिया जानकारियां एकत्रित करके भारत को भेज रहे थे। भारत की एक अन्य एजेंट की गद्दारी के कारण मोहनलाल भास्कर पकड़े गए और उसके बाद इनके ऊपर मुकदमा चलाया गया। मुकदमों के साथ यातनाओं और दरिंदगी का वह लंबा दौर मोहनलाल भास्कर ने लाहौर ,कोट लखपत,मियांवाली, मुल्तान और पाकिस्तान की विभिन्न जेलों में झेला जिसका वर्णन करते करते उन्होंने एक पूरी किताब ही लिख डाली और उसी किताब के कुछ से निकली भारत सरकार के प्रति एक मूल भावना को मैं उद्धत कर रहा हूं।
मोहनलाल भास्कर कहते हैं कि अगर मुझे अपने लिए किसी पेशे का चुनाव करना पड़े तो जासूसी मेरे लिए आखिरी विकल्प होगा.. ...जैसा कि हर जासूस के केस में होता है कोई भी देश उसे अपना जासूस स्वीकार नहीं करता और उसे एक सामान्य नागरिक बताया जाता है।इस मामले में सरकारें ज्यादा कुछ कर भी नहीं कर सकती क्योंकि औपचारिक रुप से वह यह स्वीकार नहीं कर सकती कि उन्होंने अपना जासूस किसी और देश में सूचना एकत्रित करने के लिए भेजा है। यह बात जासूस भी जानते हैं कि पकड़े जाने की स्थिति में सरकार उन्हें अपना नहीं मानेगी।
मोहनलाल भास्कर के पकड़े जाने के बाद भी यही हुआ भारत सरकार ने उन्हें भारत का नागरिक तो बताया मगर यह मानने से इनकार कर दिया कि वह भारत के जासूस हैं। पाकिस्तान में उन पर मुकदमा चला और किसी प्रकार से वह मौत की सजा से बच गए और 14 साल की उम्र कैद हुई, दूसरी ओर भारत सरकार ने मोहनलाल भास्कर के घर लिखे गए पत्र में मोहनलाल भास्कर को एक सामान्य भारतीय बताया और यह कहा कि अन्य भारतीयों के साथ उनकी भी रिहाई के प्रयास जारी हैं।भारत में पाकिस्तान की भी कुछ जासूसों को पकड़ रखा था और लगभग 7 वर्ष बाद जासूसों के अदला-बदली के प्रोग्राम में पाकिस्तानी जासूस के बदले में उन्हें भारत भेजा गया मगर वह 7 वर्ष मोहनलाल भास्कर के लिए कुछ इस प्रकार भी थे कि सामान्य व्यक्ति उस प्रताड़ना और दरिंदगी से या तो मर जायेगा या पागल हो जाएगा..
खैर कितने दिनों में मोहनलाल भास्कर ने पाकिस्तानी सरकार की सारी दरिंदगी झेलते हुए भी भारत की कोई भी खुफिया जानकारी लीक नहीं की। मोहनलाल भास्कर की रिहाई में डॉक्टर हरिवंश राय बच्चन का भी एक प्रमुख योगदान रहा जिन्होंने भारत सरकार से मोहनलाल भास्कर की पैरवी की थी।जब मोहनलाल भास्कर भा वापस भारत आ गए तो कुछ दिनों तक तो उनके या सरकारी तामझाम और आने वालों की भीड़ लगी रही मगर धीरे-धीरे भीड़ छटने लगी और मोहनलाल भास्कर को 2 जून की रोटी का भी प्रबंध करना मुश्किल हो गया।
मगर दुश्मन देश के साथ-साथ अपने देश की भी सरकारें जासूसों के प्रति कितनी क्रूर होती हैं इसका अनुभव मोहनलाल को पूर्व में अपने व्यक्तिगत मित्र और उस समय भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई से भेंट करने के बाद हुआ। मोहनलाल भास्कर ने मोरारजी से कहा कि जो भारतीय एजेंट या जासूस पाकिस्तान में पकड़े जाने जाते हैं और पाकिस्तानी जेलों में कई कई वर्षों तक भयानक यातनाएं सहते हैं, उनको तथा उनके परिवार को भारतीय सरकार को पेंशन या उचित पुरस्कार देना चाहिए, जिससे कि उनके रोजी रोटी का प्रबंध हो सके ।। 
मोहनलाल भास्कर कहते हैं कि मेरे इस निवेदन पर भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई का जो उत्तर था उसको सुनने के बाद उनका खून खौल उठा और अगर उनके पास पिस्तौल होती तो वह तब तक गोलियां बरसाते जब तक कि पूरी गोलियां खत्म नहीं हो जाती। मोरारजी देसाई का जवाब था कि हम पाकिस्तान के किये की सजा क्यों भुगतें ??क्या तुम्हारा मतलब है कि अगर पाकिस्तानी सरकार तुम्हे 20 साल तक कैद में रखती तो हम तुम्हें 20 साल का मुआवजा देते???
ध्यान दीजिए क्या वह व्यक्ति बोल रहा था जिसने इमरजेंसी में सिर्फ 19 महीने की कैद काटी और कैद में सहे तथाकथित अत्याचारों के नाम की दुहाई देकर प्रधानमंत्री की गद्दी हासिल कर ली थी और उन्होंने महीने अपनी पार्टी से संबंध जो भी लोग कैद में थे उनके लिए मोटी मोटी पेंशन भी तय कर दी थी.. अगर पाकिस्तानी जेल में प्रताड़ना से मोहनलाल भास्कर पाकिस्तान में ही मर जाते तो भारत सरकार उनके परिवार के साथ क्या व्यवहार करती इसका अनुमान आप स्वयं लगा सकते हैं।
मोहनलाल भास्कर तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के व्यवहार से इतना दुखी थे कि उन्होंने कहा कि मैं अपने संवैधानिक अधिकारों का उपयोग करके आज यह कहना चाहता हूं कि देशभक्ति के नाम का सहारा लेकर इस देश में सैकड़ों नौजवानों की जिंदगी से खिलवाड़ किया जाता है। कुछ लोग तो बेकारी का शिकार होकर इस धरने में फंसते हैं लेकिन उन्हें मिलता कुछ नहीं है बस बॉर्डर क्रॉस करते हुए दुश्मन की गोली, दुश्मन की जेल और अनगिनत अत्याचार.... यह सोच कर हैरान होती है कि भारत के तत्कालीन पाखंडी मूत्रपान करने वाले प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के पास स्मगलरों और गुंडों को अपने घर बुलाकर तीन-तीन दिन तक उनकी मेहमाननवाजी करने और उनकी समस्या सुलझाने का समय था तो था मगर जिन्होंने इस देश के लिए जान की बाजी लगाकर दुश्मन की फांसी की कोठरियों में अपना जीवन बिता दिया उनके लिए संवेदना के दो शब्द भी सरकार के पास नहीं थे..
हांलाकि अपनी पुस्तक के अंतिम भाग में मोहनलाल भास्कर ने यह माना है कि उन्होंने जो किया वह देश पर एहसान नहीं बल्कि देश के लिए अपना फर्ज निभाया मगर मोरारजी देसाई सरकार से उनकी घृणा इस स्तर की थी की पुस्तक के अंत में उन्होंने लिखा कि मोरारजी देसाई को छोड़कर जिस किसी की भी भावना मेरे लेखन से आहत हुई है उनसे मैं माफी मांगता हूँ....
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इतना लंबा
लेख लेख लिखने का मतलब यही था की आप और हम समझ सके कि सैनिकों के अलावा भी एक गुमनाम लोगो की दुनिया होती है जो प्रचार से दूर होती है..उसमें सेना के अफसर से लेकर बेरोजगार नौजवान होते हैं। कइयों की लाश नहीं मिलती.. कइयों को अपने देश में ही संदेहास्पद परिस्थिति में मरना पड़ता है और कइयों को इस देशभक्ति का इनाम ये मिलता है कि उन्हें और उनके परिवार को आजीवन न्याय नहीं मिलता और विडंबना ये की सरकार की मर्जी के बिना वो कुछ बोल भी नहीं सकते..ऐसे सभी बलिदानियों एवं उनके परिवार वालों को नमन ।।
आशुतोष की कलम से

1 टिप्पणी:

  1. जब कभी भी किसी मंत्री का बेटा पकड़ा जाएगा विदेश में जासूसी करने के इल्जाम में फिर कुर्सी के दलालों का रंडी रोना देखना |
    फिर ये तूचीये मंत्रियों को देखेंगे कि ये साले क्या करते हैं......

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