शुक्रवार, 14 अप्रैल 2017

जय भीम (दलित उद्धार के तथाकथित ठेकेदारों के लिए विशेष JAI BHIM

हिंदुओं के घर में एक कहावत है कि,हिंदुओं के बच्चे और बूढें का व्यक्तित्व, इच्छा एक जैसी हो जाती है.. कई आर उनके निर्णयों में अपरिपक्वता झलकती है और ऐसे अपरिपक्व निर्णयों और बातों का परिवार के सदस्य
"बच्चे और बुजुर्ग को एक श्रेणी में" मानते हुए इस बात का कभी भी बुरा नहीं मानते क्योंकि बुजुर्ग के दुनिया से विदाई का समय आ रहा होता है यही संस्कार भी है.
बाबा साहेब की अध्यक्षता में 7 लोगो द्वारा लिखे गए भारत के संविधान में बेकार पड़े कानूनों को खत्म करके Narendra Modi जी बाबा साहेब का "BHIM" ऐप चला रहे हैं..कांग्रेस ने संविधान की किताब में सुविधा से चीरा लगा के इसे "कांस्टीट्यूशनल अमेंडमेंट्स" का नाम दे दिया । अभी GST ने 101वां चीरा लगाके पैबंद जोड़ी है..लेकिन जब संविधान की समीक्षा कर किताब ओर नया जिल्द लगाने की बात आएगी तो BHIM ऐप हैंग होने लगता है.अंग्रेजों के जमाने से चले आ रहे, कानूनों का कामा फुलस्टाफ 70 साल में नहीं बदला पाये हमारे लोकतंत्र के डॉक्टर.
अब जिक्र बाबा साहेब का है तो उनके विचारों का जिक्र ना हो तो बात अधूरी रह जाएगी बाबा साहब का भारत पर सबसे बड़ा एहसान ये रहा कि उन्होंने जिन्ना की तरह देश के टुकड़े करने का ख्वाब नहीं देखा। मुसलमानों के बारे में बाबा साहब की स्पष्ट राय थी कि हिंदू और मुसलमान एक साथ नहीं रह सकते हिंदुओं को पाकिस्तान से भारत आ जाना चाहिए और मुसलमानों को पाकिस्तान चले जाना चाहिए। यदि स्वाभाविक रूप से हिंदू राष्ट्र हिंदुस्तान में, मुसलमान रहे तो वह जेहाद करेंगे और यह भविष्य में गृह युद्ध का कारण बनेगा। अब बाबा साहब सही थी या गलत इसका निर्णय मैं नहीं कर सकता।
बाबा साहब ने हिंदू धर्म में रहकर आजीवन छुआछूत का विरोध किया और दलितों को उनका सम्मान दिलाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई मगर जब हिंदू परिवार के इस बुजुर्ग वटवृक्ष के दुनिया से विदाई का समय आया तो अपनी मृत्यु से 57 दिन पूर्व इस हिंदू परिवार के बुजुर्ग ने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया और साथ ही साथ ब्रह्मा विष्णु महेश अवतार एवं ब्राह्मणों द्वारा प्रतिपादित की जाने वाली हर किसी कर्मकांड का निषेध कर दिया। मुझे नहीं मालूम इस निषेध में उनके ब्राह्मण उपनाम आंबेडकर एवं सारस्वत ब्राम्हण पत्नी शारदा कबीर उर्फ सविता अंबेडकर का बहिष्कार शामिल था या नहीं। मृत्यु के 57 दिन पूर्व किए गए इस निषेध को जानकर हिंदुओं की वही कहावत याद आती है जो कि मैंने इस लेख के प्रारंभ में कहा था..
बाबा साहब इस दुनिया से चले गए लेकिन उनके अनुयायियों ने निषेध जारी रखा मगर आज "जय भीम" करके बाबा साहब के नाम पर हो हल्ला करने वाले लोगों के विचारों में कई बार दोहरा चरित्र परिलक्षित होता है।
● ये स्वयंभू मूलनिवासी "जयभीम और जय मीम" का नारा लगाते हैं क्या तब अंबेडकर के विचारों का अपमान नहीं होता जो उन्होंने मुसलमानों के बारे में व्यक्त किया था?? यहाँ "जय भीम" के नाम पर कुछ लोग अपना दोहरा चरित्र दिखा देते हैं.
● वह बाबा साहेब के ब्राम्हण गुरु कृष्णा महादेव आंबेडकर और बाबा साहब की ब्राह्मण पत्नी शारदा कबीर उर्फ सविता आंबेडकर का निषेध कर देते हैं क्योंकि वह एक सारस्वत ब्राह्मण थी ,मगर मगर बाबा साहब के ब्राह्मण अध्यापक द्वारा दिए गए ब्राह्मण उपनाम आंबेडकर का निषेध नहीं कर पाते..
● वो लोग रमाबाई अंबेडकर के नाम से संस्थान योजनाएं और पार्क बनवाते हैं जिन्हें आंबेडकर की धर्मपत्नी के रूप में उनके परिवार ने चुना (विवाह के समय आंबेडकर जी 14 के साल थे अतः वो परिपक्व नहीं थे) मगर जिस शारदा कबीर को परिपक्व आंबेडकर ने रमाबाई की मृत्यु के बाद पत्नी के रूप में चुना और उसने अंतिम समय तक उनकी सेवा की उस महिला को शायद कोई नहीं जानता, उसके अध्याय को ही मिटा दिया गया..क्या ये बाबा साहेब अंबेडकर के चुनाव का विरोध न माना जाये???
● कुछ अंति उत्साही "जयभीम" वाले मूल निवासी दो कदम आगे बढ़कर अम्बेडकर की दूसरी पत्नी "शारदा कबीर" को चरित्रहीन तक बता देते हैं,बस इसलिए क्योंकि वो सारस्वत ब्राम्हण थी. तो क्या वो अंबेडकर के चुनाव के चरित्र पर प्रश्न उठाकर अंबेडकर का अपमान नहीं करते?? और इनसे इतर वो क्या कहना चाहते हैं कि जो व्यक्ति एक चरित्रहीन स्त्री के जाल में फस गया उसने इतना बड़ा संविधान सही सही कैसे लिखा होगा? या फिर मीठा मीठा गप्प और कड़वा कड़वा थू थू....
● जय भीम बोलकर वो, ब्रह्मा विष्णु महेश राम सीता कृष्ण को गाली देंगे।ब्राम्हणों को पाखंडी बताएंगे मगर बच्चे के अन्नप्राशन से लेकर मुंडन या विवाह हिन्दू कर्मकांड पद्धति से कराएंगे और जब भगवान को कोसते कोसते एक दिन दुनिया से जाने का समय हो जायेगा तो अन्तिम संस्कार भी हिन्दू पद्धति से ही होगा..
आंबेडकर जी के जन्मदिवस पर ये बाते आवश्यक थी क्योंकि दुनिया में कोई पूर्ण नहीं होता कुछ कमियां रहती है, चाहे आंबेडकर हो सावरकर हो या गांधी.अच्छी बातों को ग्रहण न करके, उनके नकारत्मकता को स्वीकारने की जल्दी हो गई है आजकल।। आज समाज में "जय भीम" का नाम लेकर ही सबसे ज्यादा "भीम" की शिक्षाओं का अपमान उनके विचारधारा के तथाकथित ठेकेदार करते आ रहे हैं..और इसके पीछे कुत्सित मकसद है राजनैतिक स्वार्थ और एक ख़ास वर्ग का विरोध जो तमाम बेड़िया डालने के बाद भी आज खुद की जगह प्रमाणिकता से समाज में बनाये हुए है....
बाबा साहेब के जन्मदिवस की शुभकामनायें.
जय भीम....
आशुतोष की कलम से.

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